उत्तर प्रदेश
विधान पुस्तकालय
उत्तर प्रदेश
विधान पुस्तकालय
की स्थापना 1921 में यू०पी० लेजिस्लेटिव
कौंसिल लाइब्रेरी
के रू० 16,000/-के प्रारम्भिक
अनुदान से हुई
थीं। इसका उद्देश्य
मुख्यतया तत्कालीन
लेजिस्लेटिव कौंसिल
के सदस्यों की
बौद्धिक आवश्यकताओं
को पूरा करना था।
सरकार के उच्चाधिकारियों
को भी पुस्तकालय
समिति की अनुज्ञा
से पुस्तकालय का
उपयोग करने की
अनुमति थी। उस
समय यह पुस्तकालय
केवल दो कमरों
में था, जिनमें
से एक का उपयोग
वाचनालय के लिए
किया जाता था।
सन् 1937 तक रू० 2000/-के वार्षिक अनुदान
से पुस्तकालय की
प्रगति मन्द गति
से होती रही। विधान
मण्डल के द्विसदनीय
हो जाने के कारण
कुछ वर्षों बाद
पुस्तकालय का नाम
उत्तर प्रदेश लेजिस्लेटिव
असेम्बली लाइब्रेरी
कर दिया गया क्योंकि
इसका प्रशासन विधान
सभा विभाग के अन्तर्गत
था। 1955-56 में
इस नाम को पुनः
बदल कर विधान पुस्तकालय
कर दिया गया। सन
1939 में युद्ध
छिड़ने एवं विधान
मण्डल के निलम्बन
के कारण पुस्तकालय
की प्रगति भी प्रायः
रूक-सी गयी।
सन 1946 में विधान मण्डल के पुनः अस्तित्व में आने पर पुस्तकालय की विकास की ओर पुनः प्रयास आरम्भ किया गया। सन 1946 से 1952 की अवधि में पुस्तकालय की वृद्धि हेतु कुल मिला कर तीन लाख पैंसठ हजार रूपये सरकार से पुस्तकालय अनुदान के रूप में प्राप्त हुआ। फलस्वरूप पुस्तकों की संख्या 31 मार्च, 1948 को रू० 42,636/- से बढ़कर 31 मार्च, 1952 को रू० 98,571/-हो गई और पुस्तकालय दो कमरों से बढ़कर विधान भवन की दूसरी मंजिल के 6 कमरों और दो बड़े हाल से युक्त पूरे दक्षिण पार्श्व में फैल गया।
पंचवर्षीय योजना
के कारण पुस्तकालय
अनुदान की धनराशि
में कमी हो जाने
के फलस्वरूप पुस्तकालय
की प्रगति फिर
कम हो गयी। सन 1953 में पुस्तकालय
का आवर्तक वार्षिक
अनुदान रू० 60,000/-से
घटाकर रू० 20,000/-कर
दिया गया। वर्ष
1960-61 तक प्रतिवर्ष
यही धनराशि पुस्तकों
तथा साज-सज्जा
हेतु पुस्तकालय
को उपलब्ध होती
रही, किन्तु वर्ष
1961-62 से इस राशि
को बढ़ाकर रू०
30,000/- कर दिया गया।
रूपये के अवमूल्यन
के कारण यह धनराशि
वर्ष 1967-68 में
बढ़ाकर रू० 37,000/-कर
दी गई। वर्ष 1972 के
अग्निकाण्ड में
पुस्तकों की हुई
क्षतिपूर्ति हेतु
पुस्तकालय को रू०
50,000/-का अतिरिक्त
वार्षिक अनुदान
दिया गया। इस प्रकार
1972 से 1977 तक पुस्तकालय
को प्रतिवर्ष रू०
87,000/- अनुदान प्राप्त
हुआ। वर्ष 1977 से पुस्तकालय
का आवर्तक अनुदान
रू० 37,000/-से बढ़ाकर
रू० 50,000/-वार्षिक
कर दिया गया। इस
प्रकार पुस्तकों
तथा साज-सज्जा
के क्रय हेतु पुस्तकालय
का आवर्तक और अनावर्तक
अनुदान वर्ष 1977 से
एक लाख रूपया हो
गया। वित्तीय वर्ष
1980-81 से आवर्तक अनुदान
की राशि 50,000 रू० से
बढ़ाकर रू० 75,000/-कर
दी गई है। इस प्रकार
कुल वार्षिक अनुदान
रूपया 1,25,000/-हो गया।
वर्ष 1985-86 से पुस्तकालय
का आवर्तक अनुदान
रू० 1,50,000 हुआ। वर्ष
1990-91 से यह आवर्तक
अनुदान रू० 3,00,000/- हो
गया। वर्ष 1993-94 में
यह रू० 3,50.000/- तथा वर्ष
1994-95 में यह आवर्तक
अनुदान रू० 4,00,000/- वर्ष
1996-97 से यह आवर्तक
अनुदान रू० 5,39,000/- और
वर्ष 1998-99 से रू०
6,50,000/- तथा 2001-2002 में यह
आवर्तक अनुदान
रू० 7,00,000/- एवं 2004-05 से रू०
7,70,000, 2005-06 में
रू० 9,00,000, 2006-07 में
यह आवर्तक अनुदान
रू० 10,00,000, 2007-08 में
यह आवर्तक अनुदान
रू० 11,00,000/- और 2008-09 में यह आवर्तक
अनुदान रू० 11,00,000/- हो
गया।
इसके अतिरिक्त
पुस्तकों की जिल्दसाजी
तथा उनकी सुरक्षा
के लिए रासायनिक
पदार्थ क्रय करने
हेतु रू० 40,000, पुस्तकालय में
लगी फोटोकापी मशीन
के अनुरक्षण पर
होने वाले व्यय
के लिए रूपया 40,000
और पुस्तकालय से
प्रकाशित होने
वाली पत्रिका "संसदीय दीपिका" में छपने वाले
लेखों के लेखकों
को मानदेय देने
हेतु रूपया 15,000 वार्षिक अनुदान
का भी प्राविधान
है।
स्थान की कमी को दूर करने के लिए 1959-60 में सरकार ने विधान भवन के दो उपभागों का निर्माण किया था। इसमें से दक्षिणी उपभाग विशेष रूप से पुस्तकालय के लिए बनाया गया था। इस भाग में छः मंजिलें हैं।
सदस्यता
पुस्तकालय
का उपयोग दोनों
सदनों के सदस्य
तथा राज्य सचिवालय
के संयुक्त सचिव
के समकक्ष पदाधिकारी
और उनसे उच्च अधिकारी
कर सकते हैं। विधान
मण्डल के दोनों
सचिवालयों के कमर्चारीगण
भी पुस्तकालय के
सदस्य हो सकते
हैं। बाहरी व्यक्ति
भी विशेष परिस्थितियों
में प्रतिभूति
जमा करने पर सदस्य
बनाए जा सकते हैं।
जिस अवधि में विधान
मण्डल सत्र में
नहीं होता है उस
समय पुस्तकालय
में बैठकर पढ़ने
की अनुमति शोध
कार्य करने वाले
छात्रों को भी
उनके विभागाध्यक्ष
की संस्तुति प्राप्त
होने पर दे दी जाती
है। इस प्रकार
विधान मण्डल के
सदस्यों के अतिरिक्त
बड़ी संख्या में
अन्य लोग पुस्तकालय
से लाभ उठा रहे
हैं।
संग्रह
पुस्तकालय में
लगभग सभी विषयों
पर पुस्तकें हैं
किन्तु अधिकतर
कृतियां सामाजिक
तथा राजनीतिक विषयों
पर हैं। संसदीय
प्रक्रिया, कानून, संविधान, सांख्यिकीय
विकास एवं नियोजन, अन्तर्राष्ट्रीय
संबंध, उच्च
कोटि के उपन्यास, जीवनियां आदि
विषयों की अच्छी
पुस्तकों को विशेष
रूप से क्रय किये
जाने की पद्धति
है। इसके अतिरिक्त
केवल उ० प्र० सरकार
के ही नहीं वरन
देश के अन्य राज्यों
और विदेशों के
कुछ महत्वपूर्ण
राजकीय प्रकाशन
भी मंगाये जाते
हैं। भारत की लोक
सभा तथा राज्य
सभा व अन्य राज्यों
की कायर्वाहियों
के अतिरिक्त ब्रिटिश
संसद की कायर्वाहियां
भी नियमित रूप
से पुस्तकालय में
मंगाई जाती हैं।
पत्र-पत्रिकाऍ
पुस्तकालय
में प्राप्त होने
वाले पत्र-पत्रिकाओं
तथा वार्षिक प्रकाशनों
की कुल संख्या
लगभग 250 हैं। पत्र-पत्रिकाओं
के नये अंकों को
विधान वाचनालय
में एक विशेष प्रकार
की आलमारी (पीरिआडिकल
स्टैण्ड) पर प्रदर्शित
किया जाता हैं।
उनका प्रयोग वाचनालय
में ही किया जा
सकता है। आवश्यक
पत्रिकाओं के पुराने
अंकों को सुरक्षित
रखा जाता हैं।
दो समाचार-पत्रों
को भी सुरक्षित
रखा जाता है।
वर्गीकरण
एवं सूचीकरण
पुस्तकों का वर्गीकरण दशमलव वर्गीकरण पद्धति के आधार पर किया जाता है तथा उनका सूचीकरण ए०एल०ए० सूचीकरण प्रणाली के द्वारा होता है। प्रत्येक पुस्तक के शीर्षक, विषय तथा लेखक के नाम से कार्ड बनाये जाते हैं। इन कार्डो को वणार्नुक्रम में कैटलाग कैबिनेट में रखा जाता है। प्रत्येक तीसरे महीने नियमित रूप से नयी सूचीकृत पुस्तकों की सूची भी छपवा कर सदस्यों में वितरित की जाती है।
शोध, संदर्भ
एवं प्रलेखीकरण
सेवा
स्वतंत्रता
प्राप्ति से अब
तक जनतांत्रिक
व्यवस्था के अन्तर्गत
प्रदेश में एक
के बाद एक हुए आम
चुनावों के फलस्वरूप
संसदीय प्रक्रिया
के क्रमिक विकास
और विधान मण्डल
के दोनों सदनों
की उत्तरोत्तर
बढ़ती हुई अत्यन्त
वेगवती सक्रियता
ने विधान मण्डल
से सम्बद्ध विधान
पुस्तकालय पर अत्यधिक
गुरूतर उत्तरदायित्व
डाल दिया है। वस्तुतः
सदन की प्रत्येक
गतिविधि से सम्बन्धित
माननीय सदस्यों
की बौद्धिक आवश्यकताओं
की सम्पूर्ति करने
का प्रयास इस पुस्तकालय
द्वारा किया जाता
हैं। कोई ऐसा विषय
नहीं है, जिसकी
चर्चा की अपेक्षा
सदन में न की जा
सके तथा उससे सम्बन्धित
साहित्य की पुस्तकालय
से मांगे जाने
की संभावना न हो।
यह विषय राजनैतिक, आर्थिक, प्रशासनिक, सामाजिक, धार्मिक, नैतिक, न्यायिक, संवैधानिक, संसदीय अथवा
कोई भी हो सकते
हैं। इनके अतिरिक्त
संवैधानिक जटिलताओं
से उलझे प्रश्न,संसदीय प्रक्रिया
से संबंधित समस्याओं, माननीय सदस्यों
के विशेषाधिकार
के प्रश्न, सदन के अवमान
के प्रश्न, आदि-आदि इतनी
बहुतायत में इस
सदन में उपिस्थत
होते हैं जिनकी
पहले कल्पना नहीं
की जा सकती थी। इन सभी प्रश्नों
के उत्तर और इन
सभी समस्याओं का
निराकरण माननीय
सदस्यों, संसदीय
अधिकारियों और
शासन को विधान
पुस्तकालय द्वारा
उपलब्ध कराना होता
है। इस पृष्ठभूमि
में इस पुस्तकालय
को अधिक उपयोगी
बनाने और सदस्यों
को अध्ययन संबंधी
अधिकाधिक सुविधा
और सेवा प्रदान
करने की दृष्टि
से पुस्तकालय की
शोध, संदर्भ एवं
प्रलेखीकरण सेवा
को पुनर्गठित किया
गया है। विधान
मण्डल के दोनों
सदनों में विचाराधीन
विषयों तथा प्रस्तुत
विधेयकों से संबंधित
अध्ययन सामग्री
प्रदान करने का
कार्य इस शाखा
द्वारा किया जाता
हैं। इस सेवा को
सुचारू रूप से
सम्पादित करने
हेतु पुस्तकालय
में एक रिप्रोग्रैफी
सेक्शन की भी व्यवस्था
की गयी है। विविध
अधिनियमों को समय-समय
पर हुए संशोधन
के अनुरूप अद्यावधिक
शुद्ध रखा जाता
है। पुस्तकालय
के साधनों से सदस्यों
की बौद्धिक आवश्यकताओं
की पूर्ति करना
इस शाखा का मुख्य
उददेश्य हैं। वांछित
सामग्री मांगे
जाने पर तुरन्त
उपलब्ध की जा सके
इस हेतु ऐसे साधन
विकसित करने की
दिशा में कार्य
किया जाता है जिससे
सदस्यगण लाभान्वित
हो सकें। इस सेवा
के अन्तर्गत पुस्तकालय
द्वारा निम्नांकित
चार पत्रिकाएं
प्रकाशित की जाती
हैं-
1. संसदीय दीपिका,
2. प्रलेख चयनिका,
3. समाचार दैनन्दिका,
4. उत्तर प्रदेश अधिनियम संक्षेपिका।
इसके अतिरिक्त सदन में विचाराधीन महत्वपूर्ण विषयों पर मा० सदस्यों की सुविधा हेतु पुस्तकालय की शोध एवं संदर्भ शाखा द्वारा पृष्ठाधार टिप्पणी (बैक ग्राउण्ड नोट्स) भी तैयार किये जाते हैं।
विधान मण्डल के सदस्यों की उनके संसदीय कार्यो को पूरा करने में सहायता देने के लिए पुस्तकालय द्वारा जो सेवाएं उपलब्ध की जाती हैं तथा पुस्तकें जारी करने के लिए प्रक्रिया है उनका उल्लेख विस्तृत रूप में उत्तर प्रदेश विधान पुस्तकालय की निर्देशिका एवं नियमावली में किया गया हैं।
कम्प्यूटर
केंद्र
विधान पुस्तकालय के कार्यों के आधुनिकीकरण और सेवाओं के सुदृढ़ीकरण हेतु विधान पुस्तकालय में वर्ष 1999 में कम्प्यूटर केंद्र स्थापित किया गया है। इस योजना के अन्तर्गत विधान सभा से सम्बन्धित महत्वपूर्ण सूचनाओं,आंकड़ों एवं घटनाओं के डाटा बेस को तैयार करने के साथ-साथ पुस्तकालय के संग्रह का विवरण भी कम्प्यूटर पर लाने का प्रयास है। 29 मई, 2001 को महामहिम राज्यपाल श्री विष्णुकान्त शास्त्री द्वारा विधान सभा की वेबसाईट www.uplegisassembly.gov.in का उदघाटन किया गया। यह वेबसाईट विधान पुस्तकालय द्वारा तैयार की गयी थी एवं अद्यावधिक की जाती हैं ।
पुस्तकालय
के महत्वपूर्ण
प्रकाशन
विधान पुस्तकालय द्वारा सत्रकाल में सदस्यों के उपयोगार्थ सामयिक विषयों पर पृष्ठाधार साहित्य के अलावा समय-समय पर अनेक महत्वपूर्ण प्रकाशन किये गये हैं जिनका व्यापक स्वागत हुआ है। प्रमुख सचिव, विधान सभा के सम्पादन और निर्देशन में ये प्रकाशन पुस्तकालय की शोध एवं सन्दर्भ सेवा द्वारा किये गये हैं। निम्नांकित प्रकाशन उल्लेखनीय हैः
1. उत्तर प्रदेश में मंत्रिमण्डलों का गठन, जनवरी, 1921 –सितम्बर, 1988
2. उत्तर प्रदेश विधान सभा स्वर्ण जयन्ती स्मारिका 1937-1987
3. विधान सभा के 32 वर्ष,
4. राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन जन्मशती स्मारक-ग्रंथ,
5. उत्तर प्रदेश विधान सभा की ऐतिहासिक रूपरेखा,
6. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल का अभिभाषण, 1937-1988,
7. ग्लिम्पसेज आफ पार्लियामेन्टरी प्रैक्टिस एंड प्रोसीजर,
8. उत्तर प्रदेश विधान सभा में प्रस्तुत असरकारी विघेयक,
9. उत्तर प्रदेश बजट भाषण, 1937-91 (दो खंडों में),
10. केशव सिंह प्रकरण,
11. उत्तर प्रदेश विधान सभा के उपवेशन और उनमें मा0 सदस्यों की उपस्थिति- 1937-1993,
12. डी० एन० मित्तलः "कलेक्शन आफ आर्टिकल्स"
13. उत्तर प्रदेश विधान सभा में माननीय श्री प्रमोद कुमार तिवारी के भाषण (वर्ष 1981 से वर्ष 1999 तक) भाग-1 तथा (वर्ष 2000 से वर्ष 2006 तक) भाग-2।
पुस्तकालय
के पद
|
क्र0सं0 |
पद |
संख्या |
|
1 |
पुस्तकाध्यक्ष
एवं मुख्य प्रलेखीकरण
अधिकारी |
1 |
|
2 |
शोध एवं संदर्भ
अधिकारी |
3 |
|
3 |
उप पुस्तकाध्यक्ष |
1 |
|
4 |
माईक्रो फोटोग्राफिस्ट |
1 |
|
5 |
शोध एवं संदर्भ
सहायक |
10 |
|
6 |
सहायक पुस्तकाध्यक्ष |
1 |
|
7 |
सूचीकार |
4 |
|
8 |
सहायक समीक्षा
अधिकारी |
10 |
|
9 |
साक्षर दफ्तरी/बुक
बाइण्डर/जेनिटर/
दफ्तरी |
10 |
|
10 |
चपरासी |
6 |
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